हमारे धर्म ग्रंथों में दान को एक महान पुण्य कर्म बताया गया है। तुलसीदास जी ने कहा है कि जैसे पंछियों के नदी का पानी पीने से नदी का जल नहीं घटता, उसी प्रकार दुखियों को दान करने से धन भी कम नहीं होता, बल्कि हजारों हाथों से लौटकर वापस आता है। यह शाश्वत सत्य हमें सिखाता है कि दान करना केवल परोपकार नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग भी है। इसी सत्य पर आधारित है यह प्रेरणादायक कहानी।

कहानी राजकुमारी का जन्मदिन और किसान का उपहार
एक समय की बात है, किसी राज्य में एक प्रतापी राजा शासन करता था। उसकी एक प्यारी बेटी थी, जिसे वह अत्यधिक स्नेह करता था। राजकुमारी का जन्मदिन नजदीक आया, और राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई:
“सुनो-सुनो! आने वाले सोमवार को राजकुमारी का जन्मदिन है। इस शुभ अवसर पर राजमहल में भव्य भोज का आयोजन किया गया है, जिसमें सभी नगरवासियों को आमंत्रित किया जाता है। साथ ही, हर नागरिक से अनुरोध है कि वे राजकुमारी के लिए कोई उपहार लेकर आएं। जिसका उपहार राजा को सबसे अधिक पसंद आएगा, उसे विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।”
राजा की घोषणा सुनकर नगरवासी अत्यंत हर्षित हुए। समृद्ध लोग सोने-चांदी के आभूषण, महंगे वस्त्र और बहुमूल्य उपहार खरीदने लगे। वहीं, एक गरीब किसान भी इस उत्सव में जाने को उत्सुक था, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह महंगा उपहार खरीद पाता।
दान की शक्ति: किसान का निस्वार्थ भाव
जब जन्मदिन का दिन आया, तो किसान की पत्नी ने घर में बचा हुआ थोड़ा सा आटा लिया और दस रोटियां बनाकर एक कपड़े में बांध दीं। किसान खुशी-खुशी राजमहल की ओर चल पड़ा।
रास्ते में उसे एक गाय और उसका बछड़ा दिखा, जो भूख के कारण व्याकुल थे। किसान को उन पर दया आ गई और उसने अपनी पोटली में से चार रोटियां निकालकर गाय और बछड़े को खिला दी। संतुष्ट गाय ने उसे आशीर्वाद दिया, जिसे किसान ने राजकुमारी को समर्पित करने की प्रार्थना की।
थोड़ी दूर आगे जाने पर उसने देखा कि एक लंगड़ा भिखारी भूख के कारण अचेत पड़ा था। किसान ने उसे पानी पिलाया और अपनी पोटली से चार और रोटियां निकालकर खिला दीं। तृप्त भिखारी ने उसे दुआएं दीं, जिसे किसान ने फिर से राजकुमारी के लिए अर्पित करने को कहा।
किसान का अनमोल उपहार
राजमहल में भव्य आयोजन चल रहा था। राजा के सामने नगरवासी अपने-अपने उपहार प्रस्तुत कर रहे थे – कोई सोने के आभूषण, कोई महंगे वस्त्र लेकर आया था। जब किसान की बारी आई, तो उसने संकोचवश अपनी फटी हुई पोटली में से बची हुई दो रोटियां निकालीं और राजा को भेंट की।
राजा क्रोधित होकर बोला, “मेरी बेटी के जन्मदिन पर तुम यह साधारण रोटियां लेकर आए हो?”
किसान ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “महाराज, यह केवल रोटियां नहीं हैं। इसमें गौ माता का आशीर्वाद और एक भूखे भिखारी की सच्ची दुआएं भी शामिल हैं।” फिर उसने अपनी पूरी यात्रा की कहानी सुनाई।
राजा की आंखों में आंसू आ गए। उसने किसान को गले लगाया और कहा, “आज मेरी बेटी के लिए न जाने कितने कीमती उपहार आए, लेकिन तुम्हारा यह उपहार सबसे अनमोल है। तुम्हारी उदारता और परोपकार को सम्मान देने के लिए, मैं तुम्हें अपने राज्य का मंत्री नियुक्त करता हूं।”
दान का प्रतिफल: सच्ची समृद्धि
इस प्रकार, केवल रोटियां दान करने वाले किसान का पूरा जीवन बदल गया। यह कहानी हमें सिखाती है कि दान करने से धन घटता नहीं, बल्कि कई गुना होकर लौटता है। यह केवल भौतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और ईश्वर का आशीर्वाद भी प्रदान करता है।
इसलिए, जब भी अवसर मिले, निस्वार्थ भाव से दान करें, क्योंकि एक हाथ से दिया गया छोटा सा दान भी हजार हाथों से लौटकर आता है।